आंध्र प्रदेश

CEC विवाद के बीच जगन मोहन रेड्डी का बदला रुख, 2023 के कानून पर केंद्र से पुनर्विचार की मांग

Kavita2
5 Oct 2026 11:08 AM IST
CEC विवाद के बीच जगन मोहन रेड्डी का बदला रुख, 2023 के कानून पर केंद्र से पुनर्विचार की मांग
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अमरावती। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) से जुड़े विवाद के बीच विपक्षी दलों के एक-दूसरे के करीब आने के संकेत मिल रहे हैं। इसी दौरान आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और YSRCP प्रमुख वाई.एस. जगन मोहन रेड्डी ने अपने सामान्य राजनीतिक रुख से अलग कदम उठाते हुए केंद्र की एक नीति का खुलकर विरोध किया है। उन्होंने केंद्र सरकार से मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून पर दोबारा विचार करने की मांग की है।

जगन मोहन रेड्डी का यह बयान इसलिए चर्चा में है क्योंकि उनकी पार्टी ने इस कानून के पारित होने के समय इसका समर्थन किया था। अब जगन ने स्वयं अपने पहले के रुख और मौजूदा मांग के बीच मौजूद विरोधाभास को स्वीकार किया है। इसके साथ ही उन्होंने चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं पर जनता के भरोसे को लोकतंत्र के लिए जरूरी बताया है।

जगन ने पिछले सप्ताह केंद्र सरकार से 'मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यालय की अवधि) अधिनियम, 2023' पर फिर से विचार करने की अपील की। यह वही कानून है जिसे पारित किए जाने के समय YSRCP का समर्थन मिला था।

अपने बदले हुए रुख को लेकर जगन ने इस तथ्य को स्वीकार किया कि उनकी पार्टी ने पहले कानून का समर्थन किया था। इसके बावजूद उन्होंने अब इसकी समीक्षा की जरूरत बताई है। उनका जोर इस बात पर है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रभावी ढंग से काम करने के लिए नागरिकों का संवैधानिक संस्थाओं पर पूरा भरोसा होना आवश्यक है।

जगन ने विशेष रूप से भारत निर्वाचन आयोग (ECI) का उल्लेख करते हुए कहा कि लोकतंत्र तभी सही तरीके से काम कर सकता है, जब लोगों को चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं पर पूर्ण विश्वास हो। उनके इस बयान को मौजूदा CEC विवाद और चुनावी संस्थाओं को लेकर जारी राजनीतिक बहस के संदर्भ में देखा जा रहा है।

YSRCP प्रमुख का यह रुख उनके हाल के राजनीतिक व्यवहार से अलग माना जा रहा है। केंद्र की नीतियों से जुड़े कई मामलों में उनकी पार्टी का रुख अन्य विपक्षी दलों से अलग रहा है। लेकिन इस बार जगन ने एक ऐसे केंद्रीय कानून पर पुनर्विचार की मांग की है, जिसे उनकी अपनी पार्टी ने संसद में समर्थन दिया था।

यही वजह है कि उनका बयान राजनीतिक रूप से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। एक तरफ विपक्षी दल CEC से जुड़े मुद्दे पर अपनी चिंताएं जाहिर कर रहे हैं, दूसरी तरफ जगन का बदला हुआ रुख भी चर्चा में आ गया है।

जगन के बयान का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उन्होंने अपनी पार्टी के पुराने रुख को नजरअंदाज करने के बजाय उसे स्वीकार किया। उन्होंने यह माना कि 2023 में संबंधित कानून को YSRCP ने समर्थन दिया था। इसके बावजूद अब उनका कहना है कि मौजूदा परिस्थितियों में इस कानून पर फिर से विचार किया जाना चाहिए।

इस पूरे मामले में जगन ने संवैधानिक संस्थाओं में जनता के विश्वास को केंद्र में रखा है। उनका कहना है कि चुनाव आयोग जैसी संस्था को लेकर जनता के बीच पूरा भरोसा होना चाहिए, क्योंकि चुनावी प्रक्रिया लोकतांत्रिक व्यवस्था का आधार है।

भारत निर्वाचन आयोग देश में चुनावी प्रक्रिया से जुड़ी संवैधानिक संस्था है। ऐसे में आयोग और उससे जुड़े पदों को लेकर राजनीतिक विवाद स्वाभाविक रूप से राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित करते हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया भी इसी कारण राजनीतिक चर्चा का विषय बनी हुई है।

2023 के कानून पर जगन की पुनर्विचार की मांग ने YSRCP के राजनीतिक रुख को भी चर्चा के केंद्र में ला दिया है। सवाल यह है कि जिस व्यवस्था का पार्टी ने पहले समर्थन किया था, अब उसी पर पार्टी प्रमुख ने पुनर्विचार की जरूरत क्यों महसूस की। हालांकि जगन ने अपने पुराने और मौजूदा रुख के बीच अंतर को स्वयं स्वीकार करते हुए जनता के विश्वास को प्रमुख आधार बनाया है।

उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब CEC से जुड़े विवाद को लेकर विपक्षी दलों के बीच नजदीकी बढ़ने की बात कही जा रही है। इस परिस्थिति में जगन की प्रतिक्रिया को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चा होना स्वाभाविक है।

हालांकि उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि YSRCP ने अन्य विपक्षी दलों के साथ मिलकर इस मुद्दे पर किसी संयुक्त राजनीतिक रणनीति का फैसला किया है। फिलहाल जगन की ओर से केंद्र सरकार से संबंधित कानून पर पुनर्विचार की मांग किए जाने की बात सामने आई है।

जगन के इस रुख में संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता प्रमुख मुद्दा बनकर सामने आई है। उन्होंने कहा है कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए लोगों का चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं पर पूरा भरोसा होना चाहिए। इस बयान के जरिए उन्होंने नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़ी बहस को जनता के विश्वास से जोड़ने की कोशिश की है।

इस घटनाक्रम का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू राजनीतिक निरंतरता से जुड़ा है। किसी कानून का पहले समर्थन करने और बाद में उस पर पुनर्विचार की मांग करने के कारण जगन के रुख में बदलाव स्पष्ट दिखाई देता है। उन्होंने इस विरोधाभास को छिपाने के बजाय सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है।

अब नजर इस बात पर रहेगी कि YSRCP इस मुद्दे पर आगे क्या कदम उठाती है। यह भी महत्वपूर्ण होगा कि पार्टी केवल कानून पर पुनर्विचार की मांग तक सीमित रहती है या भविष्य में इसमें किसी विशेष बदलाव का प्रस्ताव भी सामने रखती है।

CEC विवाद के बीच जगन मोहन रेड्डी का यह बयान राष्ट्रीय राजनीति में YSRCP की भूमिका को लेकर भी नई चर्चा पैदा कर सकता है। खासकर इसलिए क्योंकि यह हाल के समय में उन मौकों में से एक है, जब जगन ने किसी केंद्रीय नीति के खिलाफ स्पष्ट रुख अपनाया है।

फिलहाल जगन की मांग का मुख्य आधार चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं में जनता का भरोसा बनाए रखना है। उन्होंने साफ किया है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था तभी प्रभावी ढंग से काम कर सकती है, जब नागरिकों को इन संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर पूर्ण विश्वास हो।

अब केंद्र सरकार इस मांग पर क्या रुख अपनाती है और YSRCP इस मुद्दे को आगे किस स्तर तक ले जाती है, इस पर राजनीतिक नजरें रहेंगी। इतना जरूर है कि जिस 2023 के कानून को YSRCP ने पारित होने के समय समर्थन दिया था, उसी पर उसके प्रमुख जगन मोहन रेड्डी की पुनर्विचार की मांग ने CEC से जुड़ी राजनीतिक बहस को एक नया पहलू दे दिया है।

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